नई पहल

  • भारत में महानगरों/राजधानी वाले षहरों/बड़े षहरों में विकिरणकीय खतरों से निपटने के लिए गतिषील विकिरण खोज प्रणाली (एमआरडीएस) के नियोजन (स्थापना) पर परियोजनाः-लावारिस रेडियोधर्मी सामग्री/पदार्थों का पता लगाने के लिए तथा जनता को इसके खतरनाक प्रभाव से बचाने के लिए, एनडीएमए ने भारत में महानगरों/सभी राजधानी वाले षहरों तथा बड़े षहरों में नियोजित करने के लिए गतिषील विकिरण खोज प्रणालियों को राज्य/संघ राज्य क्षेत्रों को इसकी व्यवस्था “प्रषिक्षकों के प्रषिक्षक के रूप में कार्मिकों को भी प्रषिक्षण देने की योजना बनाने” हेतु एक रूपरेखा प्रस्तुत की है।
  • भूस्खलन जोखिम न्यूनीकरण योजना (एलआरएमएस)“आपदा रोकथाम रणनीति, आपदा न्यूनीकरण तथा महŸवपूर्ण भूस्खलनों की निगरानी में अनुसंधान तथा विकास कार्य” को षामिल करते हुए भूस्खलन प्रभावित राज्यों द्वारा भूस्खलन न्यूनीकरण परियोजनाओं के लिए विŸाीय सहायता प्रदान करना षामिल है जिससे पूर्व-चेतावनी प्रणाली तथा क्षमता निर्माण प्रयासों का विकास किया जा सके। यह योजना तैयारी के अधीन है।
  • बाढ़ जोखिम प्रषमन स्कीम (एफआरएमएस)इस स्कीम में क) माॅडल प्रयोजनीय बाढ़ आश्रय-स्थलों के विकास के लिए प्रायोगिक परियोजनाएं तथा ख) नदी घाटी विषिश्ट बाढ़ पूर्व-चेतावनी प्रणाली तथा बाढ़ के मामले में सुरक्षित निकासी हेतु गांव वालों को पूर्व-चेतावनी देने के लिए आप्लावन (इननडेषन) माॅडल्स को तैयार करने के लिए डिजिटल एलीवेषन मैप्स (मानचित्र) जैसे कार्यकलाप षामिल हैं। इस स्कीम, के अंतर्गत इन उपर्युक्त दो कार्यकलापों के संबंध में प्रायोगिक स्कीम को चलाने के लिए बाढ़ प्रभावित राज्यों को विŸाीय सहायता प्रदान की जानी है। यह स्कीम तैयारी के अंतर्गत है।
  • भारत में नौका दुर्घटनाओं को रोकने के लिए दिषानिर्देषों की तैयारी हेतु प्रमुख समूहः-देष में होने वाली कुछ गंभीर नौका दुर्घटनाओं जिनमें मई, 2012 में धुबरी, असम में हुई नौका दुर्घटना षामिल है जिसमें कई लोगों की जानंे गई थीं, के परिपे्रक्ष्य में गृह मंत्रालय के अनुरोध पर एनडीएमए ने एक प्रमुख समूह/कार्यकारी समूह का गठन किया है जिसमें केंद्र/राज्य सरकारों के संबंधित विभाग तथा अन्य संगठनों के प्रतिनिधि षामिल हैं जो भारत में बड़ी नौका दुर्घटनाओं को रोकने के लिए राज्य/संघ राज्य क्षेत्रों के मार्गदर्षन हेतु इस विशय पर उपयुक्त दिषानिर्देष तैयार करेंगे। प्रमुख समूहों के विचार-विमर्ष के बाद नौका सुरक्षा पर दिषानिर्देष जारी किए जा चुके हैं।

 

संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी

एक उभयनिश्ठ चेतावनी नवाचार (काॅमन अलर्टिंग प्रोटोकाॅल) की स्थापना हेतु प्रस्ताव

1.लंबे समय तक आपदा प्रबंधन को करने के लिए संचार प्रौद्योगिकी की भूमिका को एक अभिन्न अंग माना गया है। हालांकि संचार प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग की आपदा प्रबंधन के सभी चार विषेश चरणों नामतः प्रषमन, तैयारी, कार्रवाई तथा पुनर्बहाली करने में एक भूमिका है। अधिकांष अनुप्रयोग मोचन तथा पुनर्बहाली चरणों में पारंपरिक रूप से उपयोग होते रहे हैं। नई संचार तथा सूचना प्रौद्योगिकियां जो पिछले दो दषकों के दौरान उभर-कर आई हैं, विभिन्न संचार प्रणालियों के एकीकरण की और अधिक संभावनाएं प्रदान करती हैं। इंटरनेट, मोबाइल फोनो, फैक्स, ई-मेल, आकाषवाणी तथा दूरदर्षन समेत विभिन्न संचार प्रणालियों की अंतरसंचालनीयता उत्तरोत्तर कार्यात्मक होती जा रही है। परिणामस्वरूप, आपदाओं के प्रषमन तथा रोकथाम में संचार प्रौद्योगिकियों के अनुप्रयोग हेतु संभावनाएं भी बढ़ रही हैं। आपदा प्रबंधन में संचार प्रौद्योगिकियों के अनुप्रयोग के सामाजिक तथा तकनीकी, दोनों पहलू हैं। आपदा प्रबंधन हेतु इन प्रौद्योगिकियों का प्रभावी अनुप्रयोग उस सामाजिक तथा आर्थिक संदर्भ के लिए उनकी उपयुक्तता पर अत्यन्त अधिक निर्भर करता है जिसमें उनका इस्तेमाल किया जाता है।

2.सूचना तथा संचार प्रौद्योगिकी (आई.सी.टी.ई.) में हुई तीव्र प्रगति ने लोगों तथा समुदायों के जीवन को इन इन तरीकों से प्रभावित तथा परिवर्तित किया है जो अभी कुछ दषकों पहले तक लगभग असंभव थे। समाज के सभी स्तरों पर विष्वसनीय, तथा समय पर सूचना प्राप्त करना किसी आपदा के तुंरत पूर्व, दौरान तथा बाद में अति आवष्यक है।

3.संकट की स्थितियों के दौरान महत्वपूर्ण सूचना के आदान-प्रदान की पद्धतियां सामान्य जीवनचर्या की तुलना में अलग होती हैं। उचित सार्वजनिक, निजी तथा स्वयं सेवाओं को एक समन्वित, समयबद्ध तरीके से पहचानना तथा परिनियोजित करना-किसी आपदा के अग्रिम प्रबंधन हेतु-ऐसी चिंताओं जैसे अंतरसंचालनीयता तथा सामान्य मानकों का उपयोग, से निपटने की प्रतिबद्धता पर निर्भर करता है। इसके अलावा, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकियां केवल उनकी सबसे कमजोर कड़ी के रूप में ही अच्छी हैं। इसलिए आपदा संचार हेतु तैयारी का ऐसे परिदृष्यों में अनुमान लगाए जाने की आवष्यकता है। जिनमें आधार संचार माध्यमों -प्रसारण आकाषवाणी, दूरदर्षन, मोबाईल टेलीफोन, विद्युत षक्ति,  डेटा बेस प्रबंधन तथा इंटरनेट संचार- सहित किसी एकल सूचना एवं प्रौद्योगिकी तत्व से समझौता किया गया है। 

4.हाल के वर्शों में, आपदा प्रबंधन में प्रयासों को सूचना, संचार तथा अंतरिक्ष प्रौद्यागिकियों (आई.ई.सी.एस.टी.) में अप्रत्याषित विकास से प्रोत्साहन मिला है, जिनका आपदा से निपटने की तैयारी, न्यूनीकरण, प्रषमन तथा प्रबंधन में व्यापक अनुप्रयोग है। आई.सी.एस.टी. ने कई तरीकों से आपदा प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण सहायता प्रदान की हैः नामतः 

  • अवलोकन
  • निगरानी
  • आंकड़ा एकत्रण
  • नेटवर्क संचार
  • चेतावनी प्रसार 
  • सेवा डिलीवरी तंत्र
  • जी.आई.एस. डेटाबेस
  • विषेशज्ञ विष्लेशण प्रणालियां
  • सूचना संसाधन आदि

 

5.पूर्व चेतावनी आपदा जोखिम न्यूनीकरण (डी.आर.आर.) का एक बहुत अनिवार्य संगठक है क्योंकि यह ना केवल तकनीकी रूप से सटीक चेतावनियाँ उपलब्ध कराता है बल्कि यह एक ऐसी प्रणाली है जिसे जोखिम की समझ होना आवष्यक है और यह किसी आपदा को रोकने या प्रषमित करने के लिए कार्रवाई प्रारंभ करने के चरम लक्षय के साथ चेतावनी सूचना को उपलब्ध कराने वालों तथा प्राप्त करने वालों के बीच एक कड़ी होती है। 

6.पूर्व चेतावनी प्रणाली को आगे चार अलग-2 खंडों में उप-विभाजित किया जा सकता हैः

  • जोखिम जानकारी
  • तकनीकी निगरानी तथा चेतावनी सेवा
  • चेतावनियों को प्रसार तथा संचार
  • मोचन क्षमता तथा कार्रवाई हेतु तैयारी (प्राधिकारियों तथा जोखिम में पड़े व्यक्तियों द्वारा)

 

7.हाल की आपदओं ने स्पश्ट रूप से दर्षाया है कि तकनीकी सहयोग वाली ध्वनि चेतावनियों का उत्पादन इस बात के पूर्व आकलन कि जोखिम क्या है अथवा बिना किसी स्पश्ट प्रसार रणनीति तथा उचित मोचन क्षमता के व्यर्थ हो सकता है। उदाहरण के लिए वर्श 2008 में मयांमार में चक्रवात नर्गिस द्वारा मचाई गई तबाही पूर्व चेतावनी सेवा में तकनीकी विफलता के कारण नहीं थी -मयांमार मौसम विज्ञान विभाग द्वारा चेतावनी दी गई थी लेकिन पूर्व चेतावनी सेवा में अन्य तत्वों मुख्यतः संचार तथा कार्रवाई करने के तैयारी के कारण आपदा हुई। 

8.जानकारी तथा खबरों में विलंब तथा उनको तोड़-मरोड़ कर पेष किए जाने से बचने के लिए उभयनिश्ठ चेतावनी नवाचार (सी.ए.पी.) जैसे मानकों को विकसित किया जाना महत्वपूर्ण है। सी.ए.पी. विभिन्न चेतावनी प्रौद्योगिकियों के बीच आपातकालीन सतर्कता तथा सार्वजनिक चेतावनियों के आदान-प्रदान के लिए एक सामान्य फाॅर्मेट उपलब्ध कराता है। यह आदेषित आंकड़ों का एक समुच्च है जिसमें एक सतर्कता संकेत के लिए सभी जानकारी षामिल होती हैं। इसमें इलाका, अत्यावष्यकता, गंभीरता, निष्चितता, मुख्य खबर, ब्यौरा, घटना, श्रेणी, संदेष का प्रकार जैसी जानकारी और मोचन का प्रकार, भेजने वाला, प्रभावी समय तथा संदेष का प्रकार के साथ स्कोप षामिल होता है। सी.ए.पी. कई आई.सी.टी. अनुप्रयोगों को एक साथ अनेक चेतावनी प्रणालियों द्वारा लगातार प्रसारित किए जाने वाला एक चेतावनी संदेष भेजने की अनुमति देता है जो इस प्रकार चेतावनी की कारगरता को बढ़ाता है और लागत को कम करता है। सु-समन्वित बिल्डिंगों तथा अच्छी तरह तैयार किए गए संदेषों के साथ भी, दूर-दराज के क्षेत्रों में कई स्थानों पर प्रसार किया जाना अभी भी कठिन है और इसके लिए प्रौद्योगिकीय तथा गैर-प्रौद्योगिकीय समाधानों के संयोजन की आवष्यकता है। सर्वत्र संपर्कता के लिए सब जगह काम आने वाला कोई एकमात्र समाधान नहीं है-इसलिए उचित संचार उपकरणों तथ प्रक्रियाओं को तय करने के लिए समुदाय के सदस्यों की भागीदारी अनिवार्य है ताकि यह सुनिष्चित किया जा सके कि चेतावनियां एक समयबद्ध तरीके से लोगों तक पहुंच सके। आई.सी.टी. का पूर्व चेतावनी के क्षेत्र में वैष्विक, क्षेत्रीय, राश्ट्रीय तथा स्थानीय सहयोग बढ़ाने के लिए उपयोग किया जा सकता है। 

9.अतः इस विशय में यह प्रस्ताव किया जाता है कि एनडीएमए दूरसंचार विभाग, विभिन्न निजी सेवा प्रदाताओं के साथ-साथ पूर्व चेतावनी अभिकरणों को सक्रिय सहभागिता के साथ सी.ए.पी. के क्षेत्र में विभिन्न हितधारकों को षामिल करके एक कदम आगे बढ़ाना पसंद करेगा। यह सबको अच्छी तरह पता है कि उदाहरण के लिए कनाडा, संयुक्त राज्य अमरीका, रूस तथा आस्ट्रेलिया जैसे विभिन्न विकसित देषों के अलावा श्रीलंका, बंगलादेष जैसे छोटे देष अपनी जरूरतों के हिसाब से अपने लिए सबसे उपयुक्त सी.ए.पी. विकसित करने में सफल रहे हैं। 

10.इस प्रकार, एनडीएमए एक उभयनिश्ठ चेतावनी नवाचार (सी.ए.पी)-भारत केंद्र का सृजन करने के लिए एक निश्ठापूर्ण तथा प्रतिबद्ध प्रयास प्रारंभ करने के लिए दूरसंचार विभाग का आग्रह करता है ताकि यह सुनिष्चित किया जा सके कि केंद्र सरकार का संकट की घड़ियों में राज्य की मषीनरी से संपर्क न कट पाए जैसा की वर्श 2013 की उत्तराखंड त्रासदी और वर्श 2014 की जम्मू एवं कष्मीर में आई बाढ़ की घटनाओं के दौरान हुआ था।