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क्षेत्र मानचित्र

यहां दिखाए गए भारत के एक सामान्य भूस्खलन खतरा मानचित्र में भारत के विभिन्न राज्यों में अनेक खतरे वाले क्षेत्रों के हिस्सों को दर्षाया गया है। कोई भी यह देख सकता है कि भारत के उत्तर पष्चिमी तथा उत्तर पूर्वी हिमालयी क्षेत्र और पष्चिमी घाट अति असुरक्षितता के दो क्षेत्र हैं और भूस्खलन प्रवण हैं।

भूस्खलन खतरा क्षेत्र मानचित्र के लिए 1:50,000 के पैमाने तथा विषेश क्षेत्रों के लिए उत्तरोत्तर बड़े पैमाने पर एनडीएमए के दिषानिर्देषों का अनुपालन किया जा रहा है। राश्ट्रीय दूरसंवेदी केंद्र (एनआरएससी), विज्ञान तथा प्रोद्यौगिकी विभाग, भारतीय प्रोद्यौगिकी संस्थान (आईआईटी) के विष्वविद्यालयों ने इस बारे में प्रषंसनीय कार्य किया है। उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेष के चुनिंदा गलियारों (कॉरिडोरों) पर एनआरएससी के एटलस एक बहुत उपयोगी एटलस रही है। (कृपया भूस्खलन पर एनआरएससी का कार्य देखें)। विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी विभाग ने भारत में विभिन्न षैक्षिक (ऐकेडेमिक) संस्थाओं द्वारा चलाई जा रही 30 से अधिक परियोजनाओं को फंड दिया है, जिसकी रिपोर्टों के लिए विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी विभाग (एनआरडीएमए) से अनुरोध किया जा सकता है।

यहां दर्षाया गया चमोली जिला (पचैरी, 1992) में हिमालय क्षेत्र के एक भाग से 1:50,000 के पैमाने पर भूस्खलन खतरा क्षेत्र मानचित्र का एक उदाहरण है। अनेक भू-वैज्ञानिक, भू-तकनीकी पैरामीटरों पर आधारित है। ऐसे मानचित्र को परिश्कृत किया जा रहा है और जन-उपयोग हेतु सत्यापन तथा स्वीकार्यता के उच्च स्तर के लिए पुनर्विचार किया जा रहा है। लगभग 15 प्रतिषत भारतीय भू-भाग को खतरों के विभिन्न स्तरों में ढलान वाली चट्टानी सतहों (स्लोप) के वर्गीकरण के लिए 1:50,000 अथवा अधिक के पैमाने पर कवर किया जाना है। भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) और दूरसंवेदी अनुप्रयोगों का सभी संबंधित विभागों से डाटाबेस इकट्ठा करके एनडीएमए में भूस्खलन खतरा क्षेत्र निर्धारण के लिए जीआईएस के एक विषेश समूह के अधीन एनआरएससी के माध्यम से किया जा रहा है और इन्हें जीआईएस तथा अन्य एजेंसियों, सीएसआर लैबों, विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी विभाग आदि के अच्छे कार्यालयों के माध्यम से भूस्खलन प्रषमन पर एक समानान्तर विशय के रूप में जमा स्टोर किया जा रहा है।